Wednesday, July 26, 2017

पूजा पाठ

बच्चों को पूजा पाठ आदि से दूर रखें । वरना वे अभी से बाहय शक्तियों पर आश्रित हो जाएंगे । उन्हें अपने भीतर की शक्तियों को विकसित करने दीजिए

ग़ज़ल

अम्न ओ ईमां का........तलबगार हूँ मैं
फिर भी दीवानों में............शुमार हूँ मैं
अपना गम ही...........सहल नहीं होता
यूं हज़ारों का..............गमगुसार हूँ मैं
अब बगावत कहो............या गुस्ताखी
चंद गजलों का............गुनाहगार हूँ मैं
मेरा चेहरा है...................आईने जैसा
इसलिए सबको..............नागवार हूँ मैं
मजहबीयत से मुझे उसने बचाए रक्खा
अपने साक़ी का..............कर्ज़दार हूँ मैं

Saturday, July 15, 2017

सत्य से अध्यात्म तक


सत्य से अध्यात्म तक
( गुरुवर डाo  रमेश कुमार जी को सादर समर्पित )
मैं आपसे पूछता हूँ
कि आपने ऐसा क्यों माना
कि मैं
दो अलग अलग आयामों वाली
कविताओं का लेखक नहीं हो सकता ?
जो सत्य को जीता है
क्या वह
अध्यात्मिक नहीं हो सकता ?
सत्य भी तो अध्यात्म है
और अध्यात्म अंतिम सत्य ।
कविता
सत्य और अध्यात्म के मध्य का
सुनहरा तार है ,
जिसका एक सिरा धरती पर
और दूसरा आकाश के पार है ।

आज मैं
इस सत्य को समझने लगा हूँ –
“कुछ बरस कटे बनवासों में
कुछ बरस कटे रोते रोते
तब जाकर ये मालूम हुआ
सोने के हिरन नहीं होते” ।
और यह अध्यात्म भी, कि –
चरखी और डोर तो
इक बहाना है
उड़ान का अर्थ
स्वयं पतंग हो जाना है ।

आपका ये शिष्य
ज़िन्दगी की
जिस महाभारत से
गुज़र कर आया है
उसने इसे
बहुत कुछ सिखाया है ।
और आप तो जानते हैं
जब ज़िन्दगी की
किरच टूटती है
तो ज़ख्मों से कविता फूटती है  ।

कई बार
धरती छोड़ने का प्रयास किया है
कई बार
सर तुड़वाया है
अपने आप को इकारस सा पाया है
तब कहीं जाकर
थोड़ा सा आकाश पाया है ।

मेरे लिए इतना ही काफी है
कि धुंधलका छंट तो रहा है,
ज़्यादा या कम
अच्छा या बुरा
कहीं कुछ घट तो रहा है ।

आप इस उड़ान पर
संदेह मत कीजिये  
मेरी प्रसव पीर को
पराई कह कर
गाली मत दीजिये,
इमें कुछ अंश आपका भी है ।

आज अगर
एक भी बाण
निशाने पर साध पाता हूँ,
मैं
आपका एकलव्य हो जाता हूँ ।  
मैं आपकी ही
‘बस की पिछ्बत्ती’
के पीछे
दौड़ता दौड़ता यहाँ तक आया हूँ
मुझमें ये शब्द
और शब्दों में अर्थ के बीज
आप ही ने बोये हैं  ।
मैंने अपने गुरुजन में
द्रोण नहीं
कृष्ण संजोये हैं ।
और अनुभूतियों का
जो शब्दकोष मेरे पास है,


उसमें कृष्ण का अर्थ
संदेह नहीं
विश्वास है ।








घर और कार्यक्षेत्र

घर और कार्यक्षेत्र
मेरे घर और कर्मक्षेत्र में
बहुत अधिक फासला नहीं
किन्तु लगता है  ।

मेरे घर में भी बच्चे हैं
मनु और गुड़िया
वे भी अक्सर नहीं पढ़ते हैं
बहुत लड़ते झगड़ते हैं ,
लेकिन मेरी पत्नि या मुझमें से
जब भी
उन पर कोई हाथ उठाता है
तो पहले के लिए दूसरा ढाल बन जाता है ।

कई बार किसी चीज के लिए
अड़ भी जाते हैं
लेकिन मेरी जेब नाप तोल कर
और
कई बार
रख भी देते हैं
हमारे सामने
अपना पिग्गी बैंक खोल कर ।

अक्सर ये दोनों
हम दोनों से लड़ कर
एक नन्हें से थैले में
गुस्सा और दो चार कपडे भर कर
नानी के घर भाग जाते हैं ,
परन्तु थोड़ी देर बाद ही लौट आते हैं ,
पता चलता है
वहाँ किसी से बज गई ।
अर्थात जाकर भी
जा नहीं पाते हैं । 

और गुड़िया तो
जन्म के दूसरे ही दिन से
बगल में ऐसी समाई
कि आज तक निकल ही नहीं पाई ।
और सच कहूं
मुझे भी
उसके घुटनों के एहसास बिना
आज तक नींद नहीं आई ।

उधर मनु बदमाश
हर जन्मदिन पर मेरे लिए
कंघे और शैम्पू का उपहार लाता है
और मेरे शैम्पू से
मेरे ही सामने बैठ कर नहाता है
और मुझे ये कह कर चिढ़ाता है –
‘पापा,  शैम्पू भी बालों में झाग बनाता है’ ।

कुछ दिनों से
मेरी अलमारियां खोल खोल कर
मेरे कपडे, मेरे जूते
पहन कर देखता रहता है
कहता है –
‘बस एकाध साल और
मना लो खैर
देखो कितने चौड़े हो गए हैं मेरे कंधे
कितना बड़ा हो चला है मेरा पैर’  ।
उसकी दादागिरी से
मैं भयभीत नहीं होता
मुझे पता है
कि कल लेगा
तो परसों लाकर भी देगा  ।
मेरे कार्यक्षेत्र में
ऐसा कुछ भी नहीं है
कहने को वो भी एक परिवार है
वहाँ अक्सर बच्चे पढ़ते भी हैं
क्योंकि हम पढ़ाने और वो पढने को मजबूर होते हैं,
हालांकि मुहब्बत के लिए
सिर्फ कुछ ख़ास दिल मखसूस होते हैं ।
दूसरे को पीछे छोड़ने की होड़
वहाँ जो कुछ कराती है
वह तकरार नहीं
लड़ाई कहलाती है ।
और फिर वहाँ कौन किसको बचाए
रोल- नंबर, भाई- बहन नहीं होते ।

गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु के अर्थ को
आज कौन मानता है
वहाँ प्रत्येक बच्चा
नेकटाई के नीचे छिपी खाली जेब
और अपनी ताक़त के बीच के समीकरण को
अच्छी तरह जानता है ।

मेरे कार्यक्षेत्र से
कोई रास्ता
नानी के घर को नहीं जाता
इसलिए बस्ते का बोझ
चाह कर भी
लौट नहीं पाता ।
कितनी ही गुड़ियां
कितने ही मनु
हर वर्ष आते हैं
चले जाते हैं     
एहसास के नाम पर
बैंचों पर उकेरे नाम रह जाते हैं ।

वहाँ बच्चों के कंधे चौड़े होते देख कर
मैं बहुत भयभीत रहता हूँ –
पता नहीं कौन
अपना भारी भरकम पाँव उठा दे
और मेरे बचे खुचे आत्मसम्मान की धज्जियां उड़ा दे ।

और जब से
मेरे कार्यक्षेत्र का नाम
विद्यालय से संस्थान हो गया है,
मेरे घर
और मेरे कार्यक्षेत्र के बीच का फासला
और बड़ा हो गया है ---
बहुत बड़ा हो गया है ।  



Thursday, July 13, 2017

अखबार



अखबार

रोज सुबह
जब हमारे पोर्च में
आकर गिरता है अखबार
तो मेरा जर्मन शेफर्ड –‘साहब’
उस पर झपट पड़ता है
जैसे अखबार नहीं
किसी ने मांस का टुकडा फैंका हो ।

मैं जब उस से अखबार लेता हूँ
तो ऐसा लगता है
जैसे मैंने
ताजे नुंचे मांस के
खून से लथपथ लोथड़े
हाथ में उठा लिए हों ।

अखबार को छूते ही
कानों में गूंजने लगते हैं
बम धमाके,
गोलियों की आवाज़,
मर गए
या मार दिए गए लोगों की चीखें
और ऐसे नारे
जिनमें जिंदाबाद कम
और मुर्दाबाद ज़्यादा होता है ;
आँखों के सामने पसर जाता है
दूर दूर तक लाल रंग
और धुंआ,
नाक को झकझोर देती है
शमसान की शव सड़ांध ।

लो ,
पोर्च में
फिर कुछ गिरने की आवाज़ आई है
साहब
फिर भौंकने लगा है
शायद अखबार आ गया
फिर-----


Monday, July 10, 2017

तंदूर



तंदूर 

मैं अक्सर सोचता हूँ
कि हरूफ-ओ-अलफ़ाज़ को
कैसे इस्तेमाल करूं –
ज़ेहन में
इक आग जलाए रखने के लिए
या
पेट की आग बुझाने के लिए ?

दिल चाहता है
मैं अपने हरूफ-ओ-अलफ़ाज़ को
फूल , खुशबू और तितली बना दूं ;
लेकिन भूख कहती है –
इनकी रोटियाँ भी तो सकी जा सकती हैं  ।

और मैं
अपने हरूफ-ओ-अलफ़ाज़ को
थपक-थपक कर
बड़ा करता हूँ
और तंदूर में लगा देता हूँ  ।


Friday, July 7, 2017

तुम



तुम

श्वास में,उच्छ्वास में ,ह्रदय गति में ;
ह्रदय में ,मस्तिष्क में ,हर कोशिका में;
प्रेरणा में ,कल्पना ,मेरे सृजन में
तुम ही तुम
अस्तित्व बन कर
वास करतीं,
सोचता हूँ-
मैं कहाँ हूँ, मैं कहाँ हूँ ?

तुक क्षितिज में
तुम गगन में
जलधि में तुम ;
सूर्य, शशि,तारावली
भू परिधि में तुम,
तुम मेरी परिपक्वता में
ऊष्णता हो ,
तुम समापन
तुम ही मेरी भूमिका हो ।

इस पार तुम , उस पार भी तुम
सोचता हूँ-
मैं कहाँ हूँ, मैं कहाँ हूँ ?

Tuesday, July 4, 2017

कच्ची धूप


(मित्र और अनुज सम Yogesh Sarwad की बिटिया तितीक्षा के जन्मदिन पर लिखी कविता)


कच्ची धूप

कच्ची धूप का
सुबह- सवेरे
सपनीले पेड़ों पर चढ़ना
कभी उतरना,
या मेरे घर के आँगन में
पोले-पोले पैरों चलना,
रुनझुन रुनझुन
छम छम करना
अच्छा लगता है  ।

गई रात
अम्बर बाबा के
प्यार भरे चौड़े सीने से
घुटने जोड़ के सोना उसका,
तारों जैसी ठंडक वाली
मीठी मीठी बांह ओढ़ कर
सुख सपनों में खोना उसका,
अलसाई- अलसाई उठ कर
घर में चारों ओर बिखरना
अच्छा लगता है  ।

पूजा पाठ

बच्चों को पूजा पाठ आदि से दूर रखें । वरना वे अभी से बाहय शक्तियों पर आश्रित हो जाएंगे । उन्हें अपने भीतर की शक्तियों को विकसित करने दीजिए ...