Saturday, July 15, 2017

सत्य से अध्यात्म तक


सत्य से अध्यात्म तक
( गुरुवर डाo  रमेश कुमार जी को सादर समर्पित )
मैं आपसे पूछता हूँ
कि आपने ऐसा क्यों माना
कि मैं
दो अलग अलग आयामों वाली
कविताओं का लेखक नहीं हो सकता ?
जो सत्य को जीता है
क्या वह
अध्यात्मिक नहीं हो सकता ?
सत्य भी तो अध्यात्म है
और अध्यात्म अंतिम सत्य ।
कविता
सत्य और अध्यात्म के मध्य का
सुनहरा तार है ,
जिसका एक सिरा धरती पर
और दूसरा आकाश के पार है ।

आज मैं
इस सत्य को समझने लगा हूँ –
“कुछ बरस कटे बनवासों में
कुछ बरस कटे रोते रोते
तब जाकर ये मालूम हुआ
सोने के हिरन नहीं होते” ।
और यह अध्यात्म भी, कि –
चरखी और डोर तो
इक बहाना है
उड़ान का अर्थ
स्वयं पतंग हो जाना है ।

आपका ये शिष्य
ज़िन्दगी की
जिस महाभारत से
गुज़र कर आया है
उसने इसे
बहुत कुछ सिखाया है ।
और आप तो जानते हैं
जब ज़िन्दगी की
किरच टूटती है
तो ज़ख्मों से कविता फूटती है  ।

कई बार
धरती छोड़ने का प्रयास किया है
कई बार
सर तुड़वाया है
अपने आप को इकारस सा पाया है
तब कहीं जाकर
थोड़ा सा आकाश पाया है ।

मेरे लिए इतना ही काफी है
कि धुंधलका छंट तो रहा है,
ज़्यादा या कम
अच्छा या बुरा
कहीं कुछ घट तो रहा है ।

आप इस उड़ान पर
संदेह मत कीजिये  
मेरी प्रसव पीर को
पराई कह कर
गाली मत दीजिये,
इमें कुछ अंश आपका भी है ।

आज अगर
एक भी बाण
निशाने पर साध पाता हूँ,
मैं
आपका एकलव्य हो जाता हूँ ।  
मैं आपकी ही
‘बस की पिछ्बत्ती’
के पीछे
दौड़ता दौड़ता यहाँ तक आया हूँ
मुझमें ये शब्द
और शब्दों में अर्थ के बीज
आप ही ने बोये हैं  ।
मैंने अपने गुरुजन में
द्रोण नहीं
कृष्ण संजोये हैं ।
और अनुभूतियों का
जो शब्दकोष मेरे पास है,


उसमें कृष्ण का अर्थ
संदेह नहीं
विश्वास है ।








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