Friday, April 13, 2018

ग़ज़ल - 4

रंगों खुश्बू से गुलों को.........है संवारा किसने 
खोल रक्खा है चमन में........ये इदारा किसने
हुस्ने मतला
शाम से मांग के......कांधों का सहारा किसने
चाँद को रात की खूंटी से.......उतारा किसने
गर अंधेरे तेरा साजिश में.....कोई हाथ न था
ये बता फिर मेरी तस्वीर को......मारा किसने 
ठीक है....मैं भी न मुड़ने से कदम रोक सका
दूर जाकर मुझे.........हर बार पुकारा किसने 
ये जो बादल से तुम......इतराये हुए फिरते हो
नाम लिक्खा था हवाओं पे....तुम्हारा किसने
तू जो हर बात पे.....शोले सा भड़क उठता है
भर दिया खूँ में तेरे.......खौलता पारा किसने
साथ ले जाते हैं सब कुछ ये हवाओं के गुज़र
नक़्शे पा रेत पे देखा है..........दुबारा किसने
ये हवाएं.......ये अंधेरा.....ये ठिठुरता मौसम
दे दिया झील के हाथों में......शिकारा किसने

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